शंकराष्टकम्

!!! शंकराष्टकम् !!!
श्रीयोगानन्द विरचित प्रस्तुत शंकराष्टकं का नित्य प्रातः और सायं पाठ करने से समस्त पाप नष्ट होजाते है। पुण्योदय होने से नितनूतन सुफल-परिणाम प्राप्त होते है-
हे वामदेव शिवशंकर दीनबंधो काशीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्। हे विश्वनाथ भवबीज जनार्तिहारिन्, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।१।।
हे भक्तवत्सल सदाशिव हे महेश, हे विश्वतात जगदाश्रय हे पुरारे। गौरीपते मम पते ममप्राणनाथ, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।२।।
हे दुःखभंजक विभो गिरिजेश शूलिन्, हे वेदशास्त्रविनिवेद्य जनैकबन्धो। हे व्योमकेश भुवनेश जगद्विशिष्ट, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।३।।
हे धूर्जटे गिरिश हे गिरिजार्धदेह, हे सर्वभूतजनक प्रमथेश देव। हे सर्वदेव परिपूजित पादपद्म, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।४।।
हे देवदेव वृषभध्वज नन्दिकेश, कालीपते गणपते गजचर्मवास। हे पार्वतीश परमेश्वर रक्ष शंभो, संसारदुःखगहनाद् दहनाच्च शश्वत्।।५।।
हे वीरभद्र भववैद्य पिनकपाणे, हे नीलकण्ठ मदनान्त शिवाकलत्र। वाराणसीपुरपते भवभीतिहारिन्, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।६।।
हे कालकाल मृड शर्व सदासहाय, हे भूतनाथ भवबाधक हे त्रिनेत्र। हे यज्ञशासक यमान्तक योगिवन्द्य, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।७।।
हे वेदवेद्य शशिशेखर हे दयालो, हे सर्वभूतप्रतिपालक शूलपाणे। हे चन्द्रसूर्य शिखिनेत्र चिदेकरूप, संसारदुःखगहनाज्जगदीश रक्ष।।८।।
श्रीशंकराष्टकमिदं योगानन्देन निर्मितम्। सायं प्रातः पठेन्नित्यम्, सर्वपापविनाशकम्।।९।।
इति श्रीयोगानन्दतीर्थविरचितं शंकराष्टकं संपूर्णम्।।